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योग से रोग और शोक का निदान

।।ॐ।।योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।।ॐ।।

योग से चित्त वृत्तियों का निरोध किया जा सकता है। चित्त में ही रोग और शोक उत्पन्न होते हैं जो शरीर, मन और मस्तिष्क को क्षतिग्रस्त कर देते हैं। सदा खुश और हंसमुख रहना जीवन की सबसे बड़ी सफलता होती है।

पतंजलि से श्रेष्‍ठ मनोवैज्ञानिक खोजना मुश्‍किल है। पतंजलि कहते हैं कि इस 'चित्त' को समझो, तो रोग और शोक की जड़ का पता चलेगा। पतंजलि मानते हैं कि सभी रोगों की शुरुआत चित्त की अतल गहराई से होती है। शरीर और मस्तिष्क पर उसका असर बाद में नजर आता है। चित्त का अर्थ है अंत:करण। योग में ‍बुद्धि, अहंकार और मन इन तीनों को मिलाकर 'चित्त' कहा गया है।

मन को जानने को ही मनोविज्ञान कहते हैं, लेकिन अब आप सोचें मन से बढ़कर तो चित्त है। चित्त पर चिपकते रहते हैं जीवन के सुख, दुख और अच्छे-बुरे घटना क्रम। चित्त हमारी पांचों इंद्रियों (आंख, कान, जिभ, नाक और यौनांग) से राग, द्वेष आदि अच्छाइयां, बुराइयां और प्रकृति ग्रहण करता है।

वृत्तियां पांच प्रकार की होती है:- (1)प्रमाण, (2)विपर्यय, (3)विकल्प, (4)निद्रा और (5)स्मृति। कर्मों से क्लेश और क्लेशों से कर्म उत्पन्न होते हैं- क्लेश पांच प्रकार के होते हैं- (1)अविद्या, (2)अस्मिता, (3)राग, (4) द्वेष और (5)अभिनिवेश। इसके अलावा चित्त की पाँच भूमियां या अवस्थाएं होती हैं। (1)क्षिप्त, (2)मूढ़, (3)विक्षित, (4)एकाग्र और (5)निरुद्ध। ऊपर लिखें एक-एक शब्द और उनके अर्थ को समझने से स्वयं के चित्त को समझा जा सकता है। चित्त को समझने से रोग और शोक स्वत: ही हटने लगते हैं।

चित्त वृत्तियाँ: 
(1) प्रमाण : प्रमाण के तीन प्रकार है- प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द। यही शुद्ध चित्त वृत्ति है कि हम जैसा देख रहे हैं वैसा ही व्यक्त कर रहे हैं। कुछ लोग उसमें लाग-लपेट कर व्यक्त करते हैं जिससे भीतर अविश्वास पनपता है।
(2) विपर्यय : विपर्यय को मिथ्याज्ञान कहते हैं। इसके अंतर्गत संशय या भ्रम को ले सकते हैं। जैसे रस्सी को देखकर हम उसे सांप समझने की भूल करते रहें। यह भी भयभीत रहने का मनोविज्ञान है।
(3) विकल्प : शब्द ज्ञान से उपजा सत्यशून्य ज्ञान जिसे 'कल्पना' मात्र माना गया है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कि खरगोश के सिर पर सिंग की कल्पना की जाए। कल्पना में जीने वाले लोगों की ही संख्या अधिक है। कल्पना में जीते रहने से भी कई प्रकार के मनोरोग उत्पन्न होते हैं और व्यक्ति वर्तमान से कट कर दुखों को निर्मित कर लेता है।
(4) निद्रा : निद्रा ज्ञान का अभाव मानी जाती है, किंतु इसके अस्तित्व और वृत्तित्व में संदेह नहीं किया जा सकता क्योंकि सोते वक्त नहीं, जागने पर व्यक्ति को भान होता है कि उसे खूब गहरी नींद आई। ‍नींद में भी चित्त की समस्त वृत्तियां सक्रिय रहती है तभी तो अच्छे और बुरे स्वप्न आते हैं।
(5) स्मृति : संस्कारजन्य ज्ञान है। इसके कई विस्तृत पहलू है। इससे भी कई तरह के मनोरोग उत्पन्न होते हैं। अच्छी या बुरी घटनाओं की स्मृति रहने से क्लेश उत्पन्न होते हैं।

पंच क्लेश: 
(1) अविद्या : अनित्य, अशुचि, दुख तथा अनात्म में नित्य, शुचि, सुख और आत्मबुद्धि रखना अविद्या है, यह विपर्यय या मिध्याज्ञान हैं।
(2) अस्मिता : पुरुष (आत्मा) और चित्त नितांत भिन्न हैं दोनों को एक मान लेना अस्मिता है।
(3) राग : सेक्स के बजाय हम इसे राग कहते हैं। विषय सुखों की तृष्णा या आसक्ति राग है।
(4) द्वेष : सुख के अवरोधक और दुख के उत्पादक के प्रति जो क्रोध और हिंसा का भाव है उसे द्वेष कहते हैं।
(5) अभिनिवेश : आसक्ति और मृत्यु का भय स्वाभाविक रूप से सभी प्राणियों में विद्यमान रहता है।

चित्त की अवस्थाएँ: 
(1) क्षिप्त : क्षिप्त चित्त रजोगुण प्रधान रहता है। ऐसे व्यक्ति बहुत ज्यादा व्यग्र, चंचल, अस्थिर और विषयोन्मुखी रहते हैं। यह सुख-दुख में तूफान से घिरी नाव की तरह है।
(2) मूढ़ : मूढ़ चित्त तमोगुण प्रधान है। ऐसा व्यक्ति विवेकशून्य, प्रमादी, आलसी तथा निद्रा में पड़ा रहता है या विवेकहीन कार्यो में ही प्रवृत्त रहता है।
(3) विक्षिप्त : विक्षिप्त का अर्थ विशेष रूप से क्षिप्त, अर्थात अधिक क्षिप्त नहीं, लेकिन क्षिप्त से उत्तम। विक्षिप्त चित्त में सत्वगुण की अधिकता होती है, लेकिन कभी-कभी रजोगुण भी जोर मारता है।
(4) एकाग्र : चित्त की चौथी अवस्था में यहाँ रज और तम गुण दबे रहते हैं और सत्व की प्रधानता रहती है। चित्त बाहरीवृत्तियों से रहित होकर ध्येयवृत्ति पर ही स्थिर या एकाग्र रहता है। लक्ष्य के प्रति एकाग्र रहता है।
(5) निरुद्ध : इस अवस्था में वृत्तियों का कुछ काल तक निरोध हो जाता है, किंतु उसके संस्कार बने रहते हैं।

उक्त पाँच अवस्थाओं में से प्रथम तीन अवस्थाओं को समझना आवाश्यक है क्योंकि यही सारे मनोरोग और शारीरिक रोग की जड़ का हिस्सा है। चित्त वृत्तियों को समझने से ही क्लेश और अवस्थाएं समझ में आती है। जो व्यक्ति योगश्चित्तवृत्ति को समझता है वही उसका निरोध भी कर सकता है। अर्थात स्वयं को समझने के लिए स्वयं के चित्त को समझना आवश्यक है जिससे रोग और शोक का निदान होता है।

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