कमर को बनाये लचकदार

यदि आपकी कमर और पेट लचकदार तथा संतुलित हैं तो स्फूर्ति और जोश तो कायम रहेगा ही साथ ही आप कई तरह के रोग से बच जाएंगे। अनियमित और अत्‍यधिक खान-पान के कारण कमर के कमरा बनने में देर नहीं लगती। कमर के छरहरा होने से व्यक्ति फिट नजर तो आता ही है साथ ही उसमें फूर्ति भी बनी रहती है। कमर को छरहरा बनाए रखने के लिए यहाँ प्रस्तुत है कुछ योगा टिप्स।

दुनिया भर में आज 'योग' का 'महायोग'

भारत समेत विश्व के 192 देश रविवार को पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाएंगे। राजधानी दिल्ली भी योग दिवस के लिए तैयार है। इस अवसर पर आयुष मंत्रालय द्वारा आयोजित 35 मिनट का कार्यक्रम सुबह साढ़े छह बजे शुरू होगा।

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी राजपथ पर होने वाले भव्य कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। अनुमान है कि 37 हजार लोग राजपथ पर आकर योगाभ्यास करेंगे। सरकार को उम्मीद है कि एक ही जगह पर सबसे ज्यादा लोगों द्वारा योग करने का रिकॉर्ड बन जाएगा, जिसे गिनीजवर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह मिलेगी।

 

ಹಲ್ಲಾಸನ್

ಈ ಭಂಗಿಯಲ್ಲಿ ದೇಹದ ಆಕಾರವು ನೇಗಿಲಿನಂತೆ ಆಗುತ್ತದೆ. ಇದರಿಂದ ಇದನ್ನು ಹಲಾಸನ ಎಂದು ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ. ನಮ್ಮ ದೇಹವನ್ನು ಸುಲಭವಾಗಿ ಹೊಂದಿಸಲು ಹಲಾಸನ್ ಮುಖ್ಯವಾಗಿದೆ. ಇದು ನಮ್ಮ ಬೆನ್ನುಮೂಳೆಯನ್ನು ಯಾವಾಗಲೂ ಚಿಕ್ಕದಾಗಿರಿಸುತ್ತದೆ.

ಈ ಭಂಗಿಯಲ್ಲಿ, ಆಕಾರವು ನೇಗಿಲನ್ನು ಹೋಲುತ್ತದೆ, ಆದ್ದರಿಂದ ಇದನ್ನು ಹಲಾಸನ ಎಂದು ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ.

ಹಲಾಸನ ಮಾಡುವ ವಿಧಾನ:

ਹਲਾਸਨ

ਇਸ ਆਸਣ ਵਿਚ, ਸਰੀਰ ਦੀ ਸ਼ਕਲ ਹਲ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬਣ ਜਾਂਦੀ ਹੈ. ਇਸ ਤੋਂ ਇਸ ਨੂੰ ਹਲਸਾਨਾ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ. ਹਲਸਾਨ ਸਾਡੇ ਸਰੀਰ ਨੂੰ ਲਚਕਦਾਰ ਬਣਾਉਣ ਲਈ ਮਹੱਤਵਪੂਰਣ ਹੈ. ਇਹ ਸਾਡੀ ਰੀੜ੍ਹ ਦੀ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਜਵਾਨ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ.

ਇਸ ਆਸਣ ਵਿਚ ਸ਼ਕਲ ਇਕ ਹਲ ਵਰਗੀ ਹੈ, ਇਸ ਲਈ ਇਸਨੂੰ ਹਲਸਾਨਾ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ.

ਹਲਸਨਾ ਕਰਨ ਦਾ :ੰਗ:

घुटनों के लिए जानू नमन आसन

ढलती उम्र में व्यक्ति को जोड़ों से संबंधित रोग होने लगते हैं। अंग-अंग दुखता है। ज्यादा दूर चला नहीं जाता या बहुत ऊपर चढ़ा नहीं। व्यक्ति तभी तक जवान रहता है, जब तक उसके सभी अंग और जोड़ तनावरहित रहते हैं। जो लोग जानू नमन आसन करते रहते हैं उनको यह समस्या कभी नहीं सताती।

जानू घुटने को कहते हैं। क्रम से घुटनों को मोड़ने और सीधा करने को जानू नमन कहते हैं। जानू नमन आसन में अंग संचालन (सूक्ष्म व्यायाम) के अंतर्गत आता है।

गर्भाशय की समस्‍या को दूर करे पश्चिमोत्तानासन

पश्चिम अर्थात पीछे का भाग- पीठ। पीठ में खिंचाव उत्पन्न होता है, इसीलिए इसे पश्चिमोत्तनासन कहते हैं। इस आसन से शरीर की सभी माँसपेशियों पर खिंचाव पड़ता है। पशिच्मोत्तासन आसन को आवश्यक आसनों में से एक माना गया है। शीर्षासन के बाद इसी आसन का महत्वपूर्ण स्थान है। इस आसन से मेरूदंड लचीला बनता है, जिससे कुण्डलिनी जागरण में लाभ होता है। यह आसन आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है। पशिच्मोत्तासन के द्वारा मेरूदंड लचीला व मजबूत बनता है जिससे बुढ़ापे में भी व्यक्ति तनकर चलता है और उसकी रीढ़ की हड्डी झुकती नहीं है। यह मेरूदंड के सभी विकार जैसे- पीठदर्द, पेट के रोग, यकृत रोग, तिल्ली, आंतों के रोग तथा ग

छाछ या मट्ठा के औषधीय उपयोग

छ या मट्ठा से सभी परिचित हैं ।यह स्वादिष्ट एवं पाचक् होता है। अच्छी तरह जमाए दही मैं एक चौथाई जल मिलाकर मथानी से मथकर मक्खन प्रथक कर देने से छाछ या मट्ठा प्राप्त होता है । यह स्वयं तो शीघ्र पचता है अन्य
द्रव्यो को भी पचाने मैं समर्थ होता है इसी कारण इसका अनुपान
पथ्य् एवं औषधि तीनों रूप मैं होता है।
पेट दर्द की अवस्था मैं जब हाथ पैरों मैं सूजन कब्ज , सूखी खासी पेट मैं गुड़ गुड़ की आवाज आदि सहायक लक्षण हो तब छाछ मैं पीपल व सेन्धा नमक मिलाकर पीने से पेट दर्द ठीक होता है ।

कई समस्याओं का एक हल: कपालभाति

कपालभाति प्राणायाम नहीं बल्कि षट्कर्म का अभ्यास है। इसके लिए पालथी लगाकर सीधे बैठें, आंखें बंदकर हाथों को ज्ञान मुद्रा में रख लें। ध्यान को सांस पर लाकर सांस की गति को अनुभव करें और अब इस क्रिया को शुरू करें। इसके लिए पेट के निचले हिस्से को अंदर की ओर खींचे व नाक से सांस को बल के साथ बाहर फेंके। यह प्रक्रिया बार-बार इसी प्रकार तब तक करते जाएं जब तक थकान न लगे। फिर पूरी सांस बाहर निकाल दें और सांस को सामान्य करके आराम से बैठ जाएं।

ओशो —हर चक्र की अपनी नींद

सहस्‍त्रार को छोड़ कर प्रत्‍येक चक्र की अपनी नींद है। सातवें चक्र में बोध समग्र होता है। यह विशुद्ध जागरण की अवस्‍था है। इसीलिए कृष्‍ण गीता में कहते है कि योगी सोता नहीं।

“योग विज्ञान है” – ओशो

 योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग का इस्लाम, हिंदू, जैन या ईसाई से कोई संबंध नहीं है। 

जिन्हें हम धर्म कहते हैं वे विश्वासों के साथी हैं। योग विश्वासों का नहीं है, जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है। इसलिए पहली बात मैं आपसे कहना चाहूंगा वह यह कि  योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग के प्रयोग के लिए किसी तरह के अंधेपन की कोई जरूरत नहीं है।

नास्तिक भी योग के प्रयोग में उसी तरह प्रवेश पा सकता है जैसे आस्तिक। योग नास्तिक-आस्तिक की भी चिंता नहीं करता है। विज्ञान आपकी धारणाओं पर निर्भर नहीं होता; विपरीत, विज्ञान के कारण आपको अपनी धारणाएं परिवर्तित करनी पड़ती हैं। कोई विज्ञान आपसे किसी प्रकार के बिलीफ, किसी तरह की मान्यता की अपेक्षा नहीं करता है। विज्ञान सिर्फ प्रयोग की, एक्सपेरिमेंट की अपेक्षा करता है।