યોગનો કરો ઉપયોગ ને ભગાવો રોગ
યોગનો અર્થ છે : યોગશ્ચિતવૃત્તિનિરોધઃ
એટલે કે યોગ મન અથવા ચિત્તની વૃત્તિઓ કે ઇચ્છાઓને નિયંત્રણમાં રાખે છે. યોગ એ ચેતનાનું વિજ્ઞાન છે. જે વ્યક્તિ ચેતનાના દૃષ્ટિકોણથી ઘટનાઓ, સમસ્યાઓ અને ઇચ્છાઓથી પ્રભાવિત છે એ ચોક્કસ પણે અથવા નિશ્ચિત રૂપે બિમાર જ કહેવાય.
આજના સમયમાં મોટાભાગની અથવા તો ૯૦% (ટકા) બિમારીઓ માનસિક હોય છે, જે તનાવ (સ્ટ્રેસ), અનિયમિત ખાન-પાન અને કુટેવોને લીધે જ થાય છે. અત્યારની આધુનિક અને નવા પ્રયોગો સાથે શોધાયેલી યોગ પદ્ધતિ ખૂબ જ ફાયદાકારક છે.
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યોગ વિજ્ઞાન અને આરોગ્ય
|| अथ योगानुशासनम् ||
યોગદર્શનની શરૂઆત ભગવાન પતંજલિએ આ સૂત્રથી કરી છે. જેનો શાબ્દિક અર્થ ‘યોગ સંબંધિત શાસ્ત્ર પ્રસ્તુત થાય છે’ એવો થાય છે. આંતરરાષ્ટ્રીય યોગ દિન નિમિત્તે આપણા જીવનમાં યોગ પ્રસ્તુત થાય એવી મહર્ષિ પતંજલિને પણ આશા હોય. ચાલો આપણે આ સુત્રના અનુષ્ઠાન સાથે આપણા જીવનમાં યોગને પ્રગટ કરીએ.
યોગ અંગે આજકાલ આટલી બધી સાર્વત્રિક જાગૃતિ જોઇને આનંદ થાય છે. કદાચ એટલે જ આ લખાય છે, અને એટલે જ કદાચ વંચાય છે. મહર્ષિ પતંજલિ આપણી આવી રૂચી કે જાગૃતિ જો જુએ તો એમને તો હૈયે હરખ ના સમાય. પણ એમનો કે આપણો (કે ફક્ત આનંદ !!) શાશ્વત બનાવવો હોય તો...?
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आयुर्वेद एक संपूर्ण स्वस्थ जीवन शैली हॅ
आयुर्वेद अतिप्राचीन चिकित्सा पथ्दति है जिसे आज संपूर्ण विश्व मै मान्यता प्राप्त है आयुर्वेद मात्र औषधि चिकित्सा न होकर एक संपूर्ण स्वस्थ जीवन शैली हॅ । आयुर्वेदानुसार प्राकृतिक जीवन शैली अपनाने से शरीरगत् सप्तधातुआदि के पोषण एवं वात, पित्त, कफादि के समन्वप्रत्येक वह व्यक्ति ज्ञान योगी है जो सोचना सीख गया है, विचार तो सबके भीतर होते हैं, लेकिन उन विचारों को एक दिशा देना हर किसी के बस की बात नहीं, दूसरी बात कि आपके भीतर विचार कौन से हैं? क्या कचरा किताबों के विचार? खुद के विचार या उधार के विचार?
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पंचकर्म में छिपा है असाध्य रोगों का इलाज-
शरीर की शुद्घि की प्राचीन आयुर्वेदिक पद्घति है पंचकर्म। आयुर्वेद के अनुसार, चिकित्सा के दो प्रकार होते हैं- शोधन चिकित्सा एवं शमन चिकित्सा। जिन रोगों से मुक्ति औषधियों द्वारा संभव नहीं होती, उन रोगों के कारक दोषों को शरीर से बाहर कर देने की पद्घति शोधन कहलाती है। यही शोधन चिकित्सा पंचकर्म है। पंचकर्म चिकित्सा में केरल विश्वप्रसिद्घ है। अब भारत के बाकी राज्यों में भी इसका बोलबाला बढ़ रहा है।
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आयुर्वेद-मूल अवधारणाएं
आयुर्वेद भारतीय उपमहाद्वीप की एक प्राचीन चिकित्सा प्रणाली है। ऐसा माना जाता है कि यह प्रणाली भारत में 5000 साल पहले उत्पन्न हुई थी। शब्द आयुर्वेद दो संस्कृत शब्दों ‘आयुष’ जिसका अर्थ जीवन है तथा ‘वेद’ जिसका अर्थ 'विज्ञान' है, से मिलकर बना है’ अतः इसका शाब्दिक अर्थ है 'जीवन का विज्ञान'। अन्य औषधीय प्रणालियों के विपरीत, आयुर्वेद रोगों के उपचार के बजाय स्वस्थ जीवनशैली पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है। आयुर्वेद की मुख्य अवधारणा यह है कि वह उपचारित होने की प्रक्रिया को व्यक्तिगत बनाता है।
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पञ्च तत्व और हाथ का संबंध
योग के अभ्यासकों में मुद्रा विज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कुछ योग विशेषज्ञ मुद्रा को 'हस्त योगा' भी कहते हैं। मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए विभिन्न योगासन और प्राणायाम के साथ इन मुद्राओं का अभ्यास करना भी जरूरी हैं। योग मुद्रा का अभ्यास करने से शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक लाभ होता हैं।
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आयुर्वेद एक समग्र चिकित्सा पध्दति
आयुर्वेद अतिप्राचीन चिकित्सा पथ्दति है जिसे आज संपूर्ण विश्व मै मान्यता प्राप्त है आयुर्वेद मात्र औषधि चिकित्सा न होकर एक संपूर्ण स्वस्थ जीवन शैली हॅ । आयुर्वेदानुसार प्राकृतिक जीवन शैली अपनाने से शरीरगत् सप्तधातुआदि के पोषण एवं वात, पित्त, कफादि के समन्वय् से
शरीर उत्तम् स्वास्थ को प्राप्त करता है । इसके विपरित अप्राकृतिक जीवन शैलो का अनुसरण् करने से धातुगत छीणता एवं वात , पित्त, कफ मै बिषमता उत्पन्न होती है ।अधिक काल तक इन बिषमताओ के बने रहने से इनके शारिरिक व मानसिक
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गर्म पानी पीने में भले ही अच्छा न लगे
गर्म पानी पीने में भले ही अच्छा न लगे लेकिन इसके हेल्थ बेनिफिट्स आपको जरूर इसे पीने पर मजबूर कर देंगे. यूं तो 8 से 10 ग्लास पानी पीना शरीर के लिए बहुत जरूरी होता है लेकिन अगर दिन में तीन बार गर्म पानी पीने की आदत डाल ली जाए तो शरीर को बीमारियों से आसानी से बचाया जा सकता है.
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हाई बीपी समस्या के लिए करें यह तीन योग….
हाई बीपी के लिए तीन योग….
हाई बीपी से देश करीब १० करोड़ लोग पीड़ित है। हाई बीपी का मुख्य कारन है तनाव,तनाव के लिए तीन प्राणायाम बहुत ही महत्वपूर्ण है, अनुलोमविलोम,भ्रामरी और शवासन प्राणायाम।
रोज ३ से ४ लीटर पानी पीना चाहिए। लोकी का जुश साथमे आमला मिलाकर पीना चाहिए ,ध्यान रखिये लोकी कड़वी नहीं होनी चाहिए। इसे पीनी से हाई बीपी कंट्रोल होता है।
अनुलोमविलोम
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पूर्ण भुजा शक्ति विकासक योग के लाभ
योग की पूर्ण भुजा शक्ति विकासक क्रिया को करने से जहां एक ओर प्राणशक्ति का विकास होता है वहीं खुलकर गहरी सांस लेने और छोड़ने से फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है। इसके चलते प्राणशक्ति का स्तर बढ़ जाता है और व्यक्ति दिनभर चुस्त-दुरुस्त बना रहता है। इसके नियमित अभ्यास से भुजाओं की मांसपेशियां मजबूत होती हैं और कंधों की जकड़न दूर होती है। इसके नियमित अभ्यास से शरीर के सभी अंगों में प्राणशक्ति का संचार होने लगता है।
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“योग विज्ञान है” – ओशो
योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग का इस्लाम, हिंदू, जैन या ईसाई से कोई संबंध नहीं है।
जिन्हें हम धर्म कहते हैं वे विश्वासों के साथी हैं। योग विश्वासों का नहीं है, जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है। इसलिए पहली बात मैं आपसे कहना चाहूंगा वह यह कि योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग के प्रयोग के लिए किसी तरह के अंधेपन की कोई जरूरत नहीं है।
नास्तिक भी योग के प्रयोग में उसी तरह प्रवेश पा सकता है जैसे आस्तिक। योग नास्तिक-आस्तिक की भी चिंता नहीं करता है। विज्ञान आपकी धारणाओं पर निर्भर नहीं होता; विपरीत, विज्ञान के कारण आपको अपनी धारणाएं परिवर्तित करनी पड़ती हैं। कोई विज्ञान आपसे किसी प्रकार के बिलीफ, किसी तरह की मान्यता की अपेक्षा नहीं करता है। विज्ञान सिर्फ प्रयोग की, एक्सपेरिमेंट की अपेक्षा करता है।