सूर्य मुद्रा के फायदे शारीरिक ऊर्जा के लिए

सूर्य मुद्रा हमारे शरीर में गर्मी पैदा करता हैं जिससे हमारा शरीर गर्म रहता हैं, यह गर्मी हमारे तब कम आती हैं जब हम शीतल मौसम में होते हैं, अगर आप अधिक ठंडी से परेशान हैं तो आप इसे अपना सकते हैं, इससे आपके शरीर में गर्मी बनी रहेगी।

सूर्य मुद्रा करने के फायदे पाचन करें ठीक

पाचन को ठीक करने के लिए सूर्य मुद्रा एक अच्छा योग हैं, यह हमारे पाचन को ठीक करता हैं और कोलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायता करता हैं।

सूर्य मुद्रा के लाभ से वजन कम करें

सूर्य मुद्रा के वैसे तो अनेक लाभ हैं जिनमे से एक यह भी हैं कि यह वजन को कम करने मदद करती हैं, अगर आप भी मोटे होने के कारण अधिक वजन से परेशान हैं तो सूर्य मुद्रा आपके लिए बहुत ही लाभदायक हैं। सामान्यतः प्रसव के बाद जिन महिलाओं का वजन बढ़ जाता हैं तो उनके लिए सूर्य मुद्रा बहुत ही लाभकारी होती हैं, क्योंकि यह पाचन ठीक करती हैं। जिससे यह महिलाओं में वजन कम करने में मदद करती हैं।

सूर्य मुद्रा से करें बीमारियाँ ठीक

सूर्य मुद्रा हमारे शरीर में अग्नि तत्व को बढ़ा देती हैं जिसके कारण शरीर में गर्मी अधिक हो जाती हैं जो हमें सर्दी जुकाम, कफ, दमा, निमोनिया, अस्थमा, प्लुरीसी जैसी बीमारियों से बचाती हैं, यह शरीर को गर्म रखती हैं इसलिए ठंड के सभी रोगों में लाभकारी हैं। यह हमें सुबह उठ के रोज 10 से 15 मिनिट करनी हैं।

सूर्य मुद्रा करने का समय व अवधि

किसी भी प्रकार के योग को नियमित करने की आवश्यकता होती हैं अतः हमे सूर्य मुद्रा रोज करनी चाहियें, अच्छे परिणाम के लिए हमें यह मुद्रा सुबह और शाम के समय करनी चाहियें, शाम के समय आप सूर्य मुद्रा को सूर्यास्त से पहले कर सकते हैं। यह मुद्रा आप 8 मिनिट से 25 मिनिट तक दिन में तीन बार कर सकते हैं। प्रतेक बार सूर्य मुद्रा करने में कम से कम एक घंटे का अंतराल अवश्य होना चाहिए।

सूर्य मुद्रा में बरती जाने वाली सावधानियां

सूर्य मुद्रा करने के वैसे तो अनेक लाभ हैं पर इसे करने से पहले कुछ सावधानी रखनी बहुत जरुरी हैं आप इस मुद्रा को एक दिन में केवल 3 बार ही 15-15 मिनिट के लिए कर सकते हैं। इसे भोजन के पहले करें और सूर्य मुद्रा करने के बाद कम से कम एक घंटे तक भोजन ना करें।गर्मी के मौसम में इसे ज्यादा देर तक ना करें और गर्मी के समय सूर्य मुद्रा करने से पहले थोड़ा पानी पी लेना चाहिए। अधिक रक्तचाप वाले और कमजोर, दुर्बल व्यक्ति इसे ना करें। शरीर में अधिक कमजोरी होने पर सूर्य मुद्रा को ना करें।

अग्न्याशय के लिए योग पश्चिमोत्तानासन

पैंक्रियास के लिए योग पश्चिमोत्तानासन मोटापा कम करने, उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने और गुर्दे और यकृत को सक्रिय करने के लिए सबसे अच्छा योग मुद्रा है। यह थकान को कम करता है, जिगर, गुर्दे, अंडाशय और गर्भाशय को उत्तेजित करता है। पश्चिमोत्तानासन करने के लिए आप किसी साफ स्थान पर योगा मैट को बिछा के दोनों पैरों को सामने की ओर सीधा करके दण्डासन में बैठ जाएं। अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा के सीधे कर लें। अब धीरे-धीरे आगे की ओर झुके और अपने दोनों हाथों से पैर के पंजे पकड़ लें। अपनी सिर को घुटनों पर रख दें। इस आसन को 20 से 60 सेकंड के लिए करें। बेहतर परिणाम के लिए एक ही अभ्यास को दो या तीन बार दोहराएं।

प्राणायाम एवं ध्यान पर बैठने की मुद्राएँ

प्राणायाम एवं ध्यान पर बैठने की मुद्राएँ

योग में पाँच सर्वश्रेष्ठ बैठने की अवस्थाएँ/स्थितियाँ हैं :
सुखासन - सुखपूर्वक (आलथी-पालथी मार कर बैठना)।

सिद्धासन - निपुण, दक्ष, विशेषज्ञ की भाँति बैठना।

वज्रासन - एडियों पर बैठना।

अर्ध पद्मासन - आधे कमल की भाँति बैठना।

पद्मासन - कमल की भाँति बैठना।

ध्यान लगाने और प्राणायाम के लिये सभी उपयुक्त बैठने की अवस्थाओं के होने पर भी यह निश्चित कर लेना जरूरी है कि :
शरीर का ऊपरी भाग सीधा और तना हुआ है।

सिर, गर्दन और पीठ एक सीध में, पंक्ति में हैं।

प्राण, अपान और अपानवायु मुद्रा

मुद्राओं का जीवन में बहुत महत्व है। मुद्रा दो तरह की होती है पहली जिसे आसन के रूप में किया जाता है और दूसरी हस्त मुद्राएँ होती है। मुद्राओं से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ प्राप्त किया जा सकता है। यहाँ प्रस्तुत है प्राण, अपान और अपानवायु मुद्रा की विधि और लाभ।

प्राण मुद्रा : छोटी अँगुली (चींटी या कनिष्ठा) और अनामिका (सूर्य अँगुली) दोनों को अँगूठे से स्पर्श करो। इस स्थिति में बाकी छूट गई अँगुलियों को सीधा रखने से अंग्रेजी का 'वी' बनता है।

लिंग मुद्रा के फायदे

अन्य योग क्रियाओं एवं मुद्राओं की तरह लिंग मुद्रा भी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है। विशेषरुप से यह श्वसन से जुड़े विकारों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कफ, बलगम एवं गले की खराश दूर करने सहित लिंग मुद्रा के अनेकों फायदे हैं। आइये जानते हैं कुछ मुख्य फायदे के बारे में।

“योग विज्ञान है” – ओशो

 योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग का इस्लाम, हिंदू, जैन या ईसाई से कोई संबंध नहीं है। 

जिन्हें हम धर्म कहते हैं वे विश्वासों के साथी हैं। योग विश्वासों का नहीं है, जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है। इसलिए पहली बात मैं आपसे कहना चाहूंगा वह यह कि  योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग के प्रयोग के लिए किसी तरह के अंधेपन की कोई जरूरत नहीं है।

नास्तिक भी योग के प्रयोग में उसी तरह प्रवेश पा सकता है जैसे आस्तिक। योग नास्तिक-आस्तिक की भी चिंता नहीं करता है। विज्ञान आपकी धारणाओं पर निर्भर नहीं होता; विपरीत, विज्ञान के कारण आपको अपनी धारणाएं परिवर्तित करनी पड़ती हैं। कोई विज्ञान आपसे किसी प्रकार के बिलीफ, किसी तरह की मान्यता की अपेक्षा नहीं करता है। विज्ञान सिर्फ प्रयोग की, एक्सपेरिमेंट की अपेक्षा करता है।