लिंग मुद्रा के फायदे वजन घटाने के लिए

बढ़ते वजन को नियंत्रित करने के लिए भी यह मुद्रा काफी फायदेमंद है। हालांकि वजन घटाने के लिए लिंग मुद्रा को दिन में तीन बार 15 मिनट तक करने की आवश्यकता पड़ती है। इसके अलावा वजन घटाने के लिए लिंग मुद्रा की शुरूआत करने पर कम से कम दिन में आठ गिलास पानी पीना चाहिए और ठंडा भोजन जैसे दही, चावल, केला और खट्टे फलों का सेवन करना चाहिए। इसके नियमित अभ्यास से अतिरिक्त कैलोरी बर्न होती हैं। यह शरीर की अतिरिक्त कैलौरी को घटाने का कार्य करती है और मोटापे की समस्या से मुक्ति दिलाती है।

लिंग मुद्रा के फायदे सर्दी से निपटने के लिए

इस मुद्रा का उपयोग आम सर्दी से निपटने के लिए कर सकते हैं। यह मुद्रा शरीर में गर्मी पैदा करती है और सर्दियों में भी पसीना पैदा कर सकती है। यह सर्दी, अस्थमा, खांसी, साइनस और सूखे कफ को नियंत्रित करने में मदद करती है। यह मुद्रा आपके गले में कफ को ढीला कर इससे राहत दे सकती है। यदि आपको पुरानी खांसी या सर्दी है, तो यह मुद्रा आपकी मदद कर सकती है। इसको करने से सर्दी से होने वाले बुखार से राहत मिलती है।

लिंग मुद्रा के फायदे अस्थमा के इलाज में

सेहत के लिए लिंग मुद्रा बहुत फायदेमंद मानी जाती है। यह मौसम में बदलाव से उत्पन्न बीमारियों एवं कंपकंती को दूर करने में उपयोगी साबित होती है। इसके अलावा यह सांस से संबंधित रोगों एवं अस्थमा के अटैक को ठीक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लिंग मुद्रा का अभ्यास करने से गले में कफ जमा नहीं होता और खांसी की समस्या से भी छुटकारा मिलता है। पुरुषों में यौन शिथिलता को दूर करने में भी यह मुद्रा काफी लाभदायक है।

लिंग मुद्रा कितनी देर करनी चाहिए

लिंग मुद्रा का अभ्यास कभी भी किया जा सकता है। लेकिन इसे अधिक देर तक नहीं करना चाहिए क्योंकि यह शरीर में गर्म ऊर्जा (heat energy) को उत्पन्न करती है। सर्दी के मौसम में भी लिंग मुद्रा का अभ्यास करने से व्यक्ति को पसीना होता है। आवश्यकता के अनुसार लिंग मुद्रा का अभ्यास दिन में पंद्रह मिनट तक तीन बार करना चाहिए। कई विशेषज्ञों का मानना है कि लिंग मुद्रा को नियमित रुप से नहीं बल्कि आवश्यकता पड़ने पर करना चाहिए। जैसे कि अगर किसी व्यक्ति को बहुत  ठंडा लगती है, कंपकंपी होती है या फिर सर्दी खांसी और कफ की समस्या है तो इस स्थिति में लिंग मुद्रा का अभ्यास किया जा सकता है।

लिंग मुद्रा करने का तरीका

लिंग मुद्रा का अभ्यास शुरू करने से पहले यह ध्यान रखना चाहिए कि इस मुद्रा के बारे में आपको सही जानकारी होनी चाहिए। जिससे आप सटीक तरीके से लिंग मुद्रा का अभ्यास कर सकें।

लिंग मुद्रा करने का तरीका और फायदे

लिंग मुद्रा, शरीर के भीतर गर्मी को केंद्रित करने काम करती है। इसे लिंग मुद्रा इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह शरीर के अंदर के अग्नि के तत्व पर ध्यान केंद्रित करके शरीर की गर्मी को बढ़ाती है। आमतौर पर हिंदू धर्म में लिंग को भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है। लेकिन यह एक योग मुद्रा है जिसमें अंगूठे से लिंग के समान आकृति बनती है। लिंग मुद्रा को आध्यात्म से भी जोड़कर देखा जाता है। प्राचीन काल में ऋषि मुनि इस मुद्रा का अभ्यास करते थे, लेकिन लिंग मुद्रा का महत्व आज भी उतना ही है। यह शरीर के अग्नि तत्व को संतुलित रखने का कार्य करती है इसलिए निरोगी रहने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को लिंग मुद्रा का अभ्यास

बंद एवं मुद्राएं

 एवं मुद्राएं एवं मुद्राओं के अभ्यास के अभ्यास का प्रावधान हठयोग के ग्रंथों में मिलता है बंद योगाभ्यास का छोटा किंतु महत्व पूर्ण वर्ग है बंद का शाब्दिक अर्थ बांधना या नियंत्रित करना है बंद शरीर में प्राण वायु या विशेष की क्रियाओं को नियंत्रित करने का कार्य करते हैं जिससे उनकी कार्य क्षमता को पूर्ण आराम देकर बढ़ाया जा सके समानता बंदूक का प्रयोग श्वास रोकने के लिए सुरक्षा तरल के रूप में किया जाता है

चित्त की सभी वृत्तियों को रोकने का नाम योग है

योग अनेक प्रकार के होते हैं। राजयोग , कर्मयोग ,हठयोग , लययोग , सांख्ययोग , ब्रह्मयोग , ज्ञान योग ,भक्ति योग , ध्यान योग , क्रिया योग , विवेक योग ,विभूति योग व प्रकृति - पुरुष योग , मंत्र योग , पुरुषोत्तमयोग , मोक्ष योग , राजाधिराज योग आदि। मगरयाज्ञवल्क्य ने जीवात्मा और परमात्मा के मेल को ही योगकहा है।

योग क्या है योगासनों के गुण एवं योगाभ्यास के लिए आवश्यक बातें

चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है।
(मृत्यु) दु:ख से छूटने और (अमृत) आनन्द प्राप्त करने का साधन (योग) ईश्वर उपासना करना है।

योग शब्दों के बारे में भाष्यकारों के अपने-अपने मत हैं। कुछ भाष्यकारों ने योग शब्द को ‘वियोग’, ‘उद्योग’ और ‘संयोग’ के अर्थों में लिया है, तो कुछ लोगों का कहना है कि योग आत्मा और प्रकृति के वियोग का नाम है। कुछ कहते हैं कि यह एक विशेष उद्योग अथवा यत्न का नाम है, 

“योग विज्ञान है” – ओशो

 योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग का इस्लाम, हिंदू, जैन या ईसाई से कोई संबंध नहीं है। 

जिन्हें हम धर्म कहते हैं वे विश्वासों के साथी हैं। योग विश्वासों का नहीं है, जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है। इसलिए पहली बात मैं आपसे कहना चाहूंगा वह यह कि  योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग के प्रयोग के लिए किसी तरह के अंधेपन की कोई जरूरत नहीं है।

नास्तिक भी योग के प्रयोग में उसी तरह प्रवेश पा सकता है जैसे आस्तिक। योग नास्तिक-आस्तिक की भी चिंता नहीं करता है। विज्ञान आपकी धारणाओं पर निर्भर नहीं होता; विपरीत, विज्ञान के कारण आपको अपनी धारणाएं परिवर्तित करनी पड़ती हैं। कोई विज्ञान आपसे किसी प्रकार के बिलीफ, किसी तरह की मान्यता की अपेक्षा नहीं करता है। विज्ञान सिर्फ प्रयोग की, एक्सपेरिमेंट की अपेक्षा करता है।