गुडघेदुखी साठी योगासन | Janufalak Aakarshan | Fatafat Yoga-TV9
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मानेपासून ते मांड्यांपर्यंतचा जडपणा सहज जाईल | Uthith Hast Ardh Uttan Aasan | Fatafat Yoga-TV9
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Yoga for vertebrae & spine | अर्ध प्रसारीत पदोत्तान आसन | Fatafat Yoga with Dipti Deshpande-TV9
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Best Yoga moves to reduce tummy & waist | Lasya Asana | Fatafat Yoga with Dipti Deshpande -TV9
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Yoga For Muscles | प्रसारित हस्त पार्श्व कोणासन | Fatafat Yoga Ep 1-TV9
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योग का अर्थ,परिभाषा महत्व एवं उद्देश्य
प्रस्तावना ज्ञान का मूल वेदों में निहित है। दार्शनिक चिन्तन तथा वैदिक ज्ञान का निचोड आत्म तत्व की प्राप्ति है। आत्मतत्व की प्राप्ति का साधन योग विद्या के रूप में इनमें (वेद) उपलब्ध है। योगसाधना का लक्ष्य कैवल्य प्राप्ति है। वैदिक ग्रन्थ, उपनिषद्, पुराण और दर्शन आदि में यत्र-तत्र योग का वर्णन मिलता है । जिससे यह पुष्टि होती है कि योग वैदिक काल से सृष्टि में उपलब्ध है। योग के अर्थ एवं परिभाषाओं का वर्णन प्रस्तुत इकाई में किया जा रहा है।
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शून्य मुद्रा
शून्य मुद्रा -मध्यमा उंगली आकाश तत्व का प्रतिनिधित्व करती है। मध्यमा अँगुली (बीच की अंगुली) को हथेलियों की ओर मोड़ते हुए अँगूठे से उसके प्रथम पोर को दबाते हुए बाकी की अँगुलियों को सीधा रखने से शून्य मुद्रा बनती हैं।
शून्य मुद्रा करने का समय व अवधि : शून्य मुद्रा को प्रतिदिन तीन बार प्रातः,दोपहर,सायं 15-15 मिनट के लिए करना चाहिए | एक बार में भी 45 मिनट तक कर सकते हैं |
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मणक्याचे आजार दूर करणारे आसन | बद्ध हस्त आंजनेय आसन | Fatafat Yoga with Dipti Deshpande-TV9
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शारीरिक दुखणे ,सांधेदुखीपासून मिळेल मुक्ती | उत्तान मणिबंध उत्कटासन | Fatafat Yoga Ep 3-TV9
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OSHO: A Courageous Jump Into the Ocean of Life
Osho who are you? Osho replies, and says that to find yourself you must lose yourself. "My invitation is to make you aflame, and unless you know a life which is luminous and aflame all your knowledge is just a deception. You are gathering it to help you forget that the real knowledge is missing. But however great is your accumulation of the other, the objective, the world, it is not going to become a substitute for your self-knowing. With self-knowing suddenly all darkness disappears, and all separation from existence.
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“योग विज्ञान है” – ओशो
योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग का इस्लाम, हिंदू, जैन या ईसाई से कोई संबंध नहीं है।
जिन्हें हम धर्म कहते हैं वे विश्वासों के साथी हैं। योग विश्वासों का नहीं है, जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है। इसलिए पहली बात मैं आपसे कहना चाहूंगा वह यह कि योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग के प्रयोग के लिए किसी तरह के अंधेपन की कोई जरूरत नहीं है।
नास्तिक भी योग के प्रयोग में उसी तरह प्रवेश पा सकता है जैसे आस्तिक। योग नास्तिक-आस्तिक की भी चिंता नहीं करता है। विज्ञान आपकी धारणाओं पर निर्भर नहीं होता; विपरीत, विज्ञान के कारण आपको अपनी धारणाएं परिवर्तित करनी पड़ती हैं। कोई विज्ञान आपसे किसी प्रकार के बिलीफ, किसी तरह की मान्यता की अपेक्षा नहीं करता है। विज्ञान सिर्फ प्रयोग की, एक्सपेरिमेंट की अपेक्षा करता है।