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मुद्रा

लिंग मुद्रा कितनी देर करनी चाहिए

लिंग मुद्रा का अभ्यास कभी भी किया जा सकता है। लेकिन इसे अधिक देर तक नहीं करना चाहिए क्योंकि यह शरीर में गर्म ऊर्जा (heat energy) को उत्पन्न करती है। सर्दी के मौसम में भी लिंग मुद्रा का अभ्यास करने से व्यक्ति को पसीना होता है। आवश्यकता के अनुसार लिंग मुद्रा का अभ्यास दिन में पंद्रह मिनट तक तीन बार करना चाहिए। कई विशेषज्ञों का मानना है कि लिंग मुद्रा को नियमित रुप से नहीं बल्कि आवश्यकता पड़ने पर करना चाहिए। जैसे कि अगर किसी व्यक्ति को बहुत  ठंडा लगती है, कंपकंपी होती है या फिर सर्दी खांसी और कफ की समस्या है तो इस स्थिति में लिंग मुद्रा का अभ्यास किया जा सकता है।

लिंग मुद्रा करने का तरीका

लिंग मुद्रा का अभ्यास शुरू करने से पहले यह ध्यान रखना चाहिए कि इस मुद्रा के बारे में आपको सही जानकारी होनी चाहिए। जिससे आप सटीक तरीके से लिंग मुद्रा का अभ्यास कर सकें।

लिंग मुद्रा करने का तरीका और फायदे

लिंग मुद्रा, शरीर के भीतर गर्मी को केंद्रित करने काम करती है। इसे लिंग मुद्रा इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह शरीर के अंदर के अग्नि के तत्व पर ध्यान केंद्रित करके शरीर की गर्मी को बढ़ाती है। आमतौर पर हिंदू धर्म में लिंग को भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है। लेकिन यह एक योग मुद्रा है जिसमें अंगूठे से लिंग के समान आकृति बनती है। लिंग मुद्रा को आध्यात्म से भी जोड़कर देखा जाता है। प्राचीन काल में ऋषि मुनि इस मुद्रा का अभ्यास करते थे, लेकिन लिंग मुद्रा का महत्व आज भी उतना ही है। यह शरीर के अग्नि तत्व को संतुलित रखने का कार्य करती है इसलिए निरोगी रहने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को लिंग मुद्रा का अभ्यास

बंद एवं मुद्राएं

 एवं मुद्राएं एवं मुद्राओं के अभ्यास के अभ्यास का प्रावधान हठयोग के ग्रंथों में मिलता है बंद योगाभ्यास का छोटा किंतु महत्व पूर्ण वर्ग है बंद का शाब्दिक अर्थ बांधना या नियंत्रित करना है बंद शरीर में प्राण वायु या विशेष की क्रियाओं को नियंत्रित करने का कार्य करते हैं जिससे उनकी कार्य क्षमता को पूर्ण आराम देकर बढ़ाया जा सके समानता बंदूक का प्रयोग श्वास रोकने के लिए सुरक्षा तरल के रूप में किया जाता है

लिंग मुद्रा क्या है

लिंग मुद्रा एक ऐसी मुद्रा है जिसमें हथेली को इंटरलॉक करके शरीर के भीतर विभिन्न तत्वों पर ध्यान केंद्रित करने और उनके प्रवाह को बनाए रखने में सक्षम होती है। हाथ का अंगूठा मनुष्य के शरीर में अग्नि तत्व का प्रतीक होता है। लिंग मुद्रा अग्नि तत्व को मजबूत बनाने का कार्य करती है। आमतौर पर लिंग मुद्रा को ऊष्मा (Heat ) और ऊर्जा (Energy) की मुद्रा कहा जाता है। लिंग संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ पुरुष के जननांग से है। लिंग मुद्रा शरीर की ऊष्मा ऊर्जा को बढ़ाने में मदद करती है।

योनि मुद्रा करने का तरीका एवं फायदे

योनि मुद्रा पुराने समय में लोगों के जीवन का एक हिस्सा एवं दिनचर्या में शामिल थी। भारत में प्राचीन काल से ही योग और मुद्राओं का अभ्यास किया जा रहा है। मान्यताओं के अनुसार योनि मुद्रा को उस समय का स्वर्णिम काल माना जाता था। यही कारण है कि उन दिनों स्वास्थ्य प्रणाली इतनी मजबूत थी। उन दिनों जानलेवा बीमारियां जैसे कैंसर एवं एड्स नहीं था और ना ही लोग इतनी मात्रा में दवाओं का सेवन करते थे। योनि मुद्रा का अभ्यास करके लोग अपने अंदर के चक्र की कल्पना करते थे और आंतरिक आवाज को सुनते थे। इस मुद्रा का अभ्यास करने वाले लोग मानते हैं कि दांये हाथ का अधिक इस्तेमाल करने वाले लोगों को दाहिने कान से आंतरिक आव