સિદ્ધાસન

સૌપ્રથમ જમીન પર બેસી ડાબા પગને ઢીંચણથી વાળી એ પગની પાનીને સીટની નીચે રાખવી. અને જમણો પગ વાળી એ પગની પાનીને લિંગના મૂળમાં રાખવી. પછી જમણા પગના પંજાને ડાબા પગની પીડી અને સાથળ વચ્ચે ભરાવી દેવો. આસનમાં કરોડ અને કમર સીધાં એક રેખામાં રાખવા. બંને પંજાને ઢીંચણ પર ચત્તા મૂકી જ્ઞાન મુદ્રા કરવી. દ્રષ્ટિ ભ્રમરની મધ્યમાં સ્થિર કરવી. પાંચ મિનીટથી શરૂઆત કરી સમય વધારતાં વધારતાં ત્રણ કલાક સુધી સિદ્ધાસનમાં બેસી શકાય. અગત્યની વાત સમય કરતાં આસનમાં સ્થિરતા અને એકાગ્રતાથી બેસવાની છે.

 

ઉત્તાનપાદાસન

ઉત્તાનપાદાસન : ઉત્તાનપાદાસન એટલે ઉત્તાન + પાદ. ઉત્તાન શબ્દનો અર્થ થાય છે ઉઠાવવું અને પાદ એટલે પગ. ઉત્તાનપાદાસનમાં પગને ઉઠાવવામાં આવે છે.  તેથી આ આસનને ઉત્તાનપાદાસન કહેવામાં આવે છે. આ આસનને દ્વિપાદાસન પણ કહેવામાં આવે છે.

મૂળ સ્થિતિ : સ્વચ્છ આસન પર સીધા સૂઈ જાઓ.

પદ્ધતિ :

মণ্ডূকাসন

মণ্ডূকাসন

যোগশাস্ত্রে বর্ণিত আসন বিশেষ। মণ্ডূক-এর সমার্থ হলো-ব্যাঙ ব্যাঙের মতো উপবেশন ভঙ্গি অনুসারে এই আসনের নামকরণ করা হয়েছে মণ্ডূকাসন (মণ্ডূক + আসন)।

बद्ध पद्मासन

पद्मासन का अर्थ और उसके करने का तरीका : “पद्म” अर्थात् कमल। जब यह आसन किया जाता है, उस समय वह कमल के समान दिखाई पड़ता है। इसलिए इसे ‘पद्मासन’ नाम दिया गया है। यह आसन “कमलासन’ के नाम से भी जाना जाता है। ध्यान एवं जाप के लिए इस आसन का मुख्य स्थान होता है। यह आसन पुरुषों और स्त्रियों दोनों के लिए अनुकूल 

उर्ध्वोत्तानासन

आसन परिचय : उर्ध्व का अर्थ होता है ऊपर और तान का अर्थ तानना अर्थात शरीर को ऊपर की और तानना ही उर्ध्वोत्तानासन है। अनजाने में ही व्यक्ति कभी-कभी आलसवश दोनों हाथ ऊपर करके शरीर तान देता है। शरीर को ऊपर की ओर तानते हुए त्रिबंध की स्थिति में स्थिर रहना चाहिए।

आसन विधि :
*सबसे पहले सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाएं। रीढ़ व गर्दन एक सीध में रखें। इस दौरान श्वास-प्रश्वास की गति सामान्य बनाए रखें। 

* इसके बाद श्वास भरते हुए कंधों को पीछे कर हाथों को बगल से धीरे-धीरे ऊपर उठाएं। कंधे की सीध में आने पर हथेली की दिशा आसमान की ओर करते हुए हाथों को कान से लगा दें।

हरिकासन

हरिकासन को करने की विधि

  • किसी समतल स्थान पर कंबल या योग मेट बिछा ले और उस पर बैठ जाए।
  • इसके बाद अपने दोनों पैरों को घुटनों के पास से मोड़ ले और उन्हें नितम्ब के पीछे की तरफ ले जाए।
  • साथ ही अपने पंजों को आसन के समान बना कर उसके ऊपर बैठ जाए।
  • इसके बाद आपस में घुटनों को मिला ले और अपने हाथों की हथेलियों को घुटनो पर रखे, ध्यान रखे की आपके हाथ सीधे रहे ।
  • साथ ही छाती, सिर, गर्दन और पीठ को भी एकदम सीधा रखें।
  • इस अवस्था में सांसों को सामान्य रखे।
  • आपको बता दे की इस आसन की कोई निर्धारित समय सीमा नहीं होती है, आप अ

সলম্বা সুপ্তবদ্ধকোণাসন

সলম্বা সুপ্তবদ্ধকোণাসন

যোগশাস্ত্রে বর্ণিত আসন বিশেষ। লম্বমান হয়ে শায়িত অবস্থায় কোণাসন তৈরি করা হয় বলে এই  আসনের নামকরণ করা হয়েছে সলম্বা সুপ্তবদ্ধ কোণাসন।

અર્ધમત્યસ્યેન્દ્રાસન

અર્ધમત્યસ્યેન્દ્રાસન (Half Spinal Twist)  
•    પૂર્ણ મત્સ્યેન્દ્રાસન અઘરું હોવાથી શરૂઆતમાં અર્ધમત્સ્યેન્દ્રાસન કરવાની સલાહ આપવામાં આવે છે. બંનેમાં ફરક માત્ર પગને ક્યાં રાખવામાં આવે તેનો જ છે. 
•    અર્ધમત્સ્યેન્દ્રાસનમાં જમણા પગને ડાબા સાથળના મૂળમાં નહિ મૂકતાં ઢીંચણમાંથી વાળી પગની એડીને સિવણી સ્થાન પાસે અડે એવી રીતે રાખવામાં આવે છે. એથી આ આસન કરવામાં ઓછી કઠિનાઈ પડે છે. બાકીની બધી રીતે તે પૂર્ણ મત્સ્યેન્દ્રાસન જેવું છે. 

Paschimottanasana

The name Paschimotanasana comes from Sanskrit, paschima meaning “back of body” and uttana meaning “straight/extended” or “intense stretch”, and asana meaning “posture”. This asana is worth spending time on if you want a nice stretch for your hamstring and give your brain a relaxing moment. Stay in the present, breathe and challenge yourself!

“योग विज्ञान है” – ओशो

 योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग का इस्लाम, हिंदू, जैन या ईसाई से कोई संबंध नहीं है। 

जिन्हें हम धर्म कहते हैं वे विश्वासों के साथी हैं। योग विश्वासों का नहीं है, जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है। इसलिए पहली बात मैं आपसे कहना चाहूंगा वह यह कि  योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग के प्रयोग के लिए किसी तरह के अंधेपन की कोई जरूरत नहीं है।

नास्तिक भी योग के प्रयोग में उसी तरह प्रवेश पा सकता है जैसे आस्तिक। योग नास्तिक-आस्तिक की भी चिंता नहीं करता है। विज्ञान आपकी धारणाओं पर निर्भर नहीं होता; विपरीत, विज्ञान के कारण आपको अपनी धारणाएं परिवर्तित करनी पड़ती हैं। कोई विज्ञान आपसे किसी प्रकार के बिलीफ, किसी तरह की मान्यता की अपेक्षा नहीं करता है। विज्ञान सिर्फ प्रयोग की, एक्सपेरिमेंट की अपेक्षा करता है।