पेट को स्वस्थ करती- अपान मुद्रा
अपान वायु नाभि से नीचे पैरों तक विचरण करती है- पेट, नाभि, गूदा, लिंग, घुटना, पिंडली, जंघाएं, पैर सभी प्रभावित होते हैं। अतः अपान मुद्रा द्वारा नाभि से पैरों तक के सभी रोग ठीक होते हैं। अपान वायु की गति नीचे की ओर होती है। अपान मुद्रा अपान वायु को सक्रिय कर देती है। इस मुद्रा से आकाश और पृथ्वी तत्त्व बढ़ते हैं। अंगूठा, मध्यमा और अनामिका के शीर्ष भाग को आपस में मिलाने से अपान मुद्रा बनती है।
क्या होते हैं इसके लाभ
नस-नाड़ियों का शोधन होता है। इस मुद्रा से शरीर से विजातीय तत्व बाहर निकलते हैं। शरीर शुद्ध और निर्मल बनता है। पेट के सभी अंग सक्रिय होते हैं। पेट के सभी विकारों उल्टी, हिचकी, जी मिचलाना, डायरिया में लाभ होता है। पसीना आने की क्रिया को यह मुद्रा उत्तेजित करती है और शरीर की अवांछित गर्मी को बाहर निकालती है।
पैरों की जलन दूर होती है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, गुर्दे के रोग, श्वास रोग, दांत दर्द, मसूड़ों के रोग, पेशाब का रुक जाना, पेशाब की जलन, यकृत के रोग, पेट दर्द, कब्ज, पाचन रोग, बवासीर, कोलाईटस तक ठीक होते हैं।
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