पैंक्रियास (अग्नाशय) के लिए योग

अग्नाशय को स्वस्थ्य और एक्टिव रखने और सुचारु रूप से कार्य करने के लिए योग का अभ्यास किया जा सकता है। पैंक्रियास को स्वस्थ्य और एक्टिव रखने के लिए योग बहुत ही लाभदायक होता है। पैंक्रियास को अग्नाशय के नाम से भी जाना जाता है। यह हमारे पेट के अन्दर उपस्थित पाचन प्रणाली की एक ग्रंथि है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि योग वजन कम करने, मधुमेह आदि की समस्या को कम करने में आपकी मदद करता है। मधुमेह, पेट दर्द और कैंसर जैसी गंभीर समस्याओं से बचाव के लिए अपने अग्न्याशय को फिट और स्वस्थ रखना भी उतना ही आवश्यक है। शरीर के प्रत्येक अंग को फिट और ठीक बनाए रखने में योग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

बुजुर्गों के लिए योगासन- बद्धकोणासन

बुजुर्गों के लिए योगासन में यह आसन उनकी बॉवेल मूवमेंट को सुधारता है और पाचन क्रिया मजबूत करता है। इसके अलावा, इस आसन से जांघ, घुटने की मसल्स स्ट्रेच होती हैं और जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है। इसे करने के लिए कमर को सीधा रखते हुए जमीन पर बैठ जाएं और पैरों को सामने की तरफ फैला लें। अब दोनों घुटनों को मोड़ते हुए उनके तलवे अपने जननांग की तरफ लाएं। अब दोनों पैर के तलवों को एक साथ मिला लें और जितना हो सके जननांगों के पास ले जाएं। अब अपनी जांघों और घुटनों को जमीन पर टिका लें और हाथों से तलवों को पकड़ लें। अब लंबी और गहरी सांस लें और अपनी जांघों को तितली के पंखों की तरह तेज-तेज ऊपर नीचे करें। जब

दुनिया को क्यों है योग की ज़रूरत

आधुनिक युग ने मनुष्य को इतना प्रायौगिक बना दिया है कि वह हर चीज़ को वैज्ञानिक दृष्टि से परखने की कोशिश करता है। अगर उसका मस्तिष्क उस बात को मान लेता है तो वह उसे अपने जीवन में उतारने की कोशिश करता है। अगर ऐसा नहीं हो पाता तो वह अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल करके वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए उसका हल निकालने का प्रयत्न करता है। विज्ञान के कामयाब सफर ने आज मनुष्य की जिंदगी को आसान और खुबसूरत बना दिया है। यही वजह है कि आज जीवन के हर रंग और रूप में हर स्तर पर आपको विज्ञान की झलक देखने को मिल जाएगी। आज हम कह सकते हैं कि आज का युग वैज्ञानिक युग है। आज विज्ञान ने हर क्षेत्र में तेज़ी से विकास किया है।

योग करें और किडनी को मजबूत बनाए

किडनी शरीर के मुख्य अंगों में से एक है। शरीर में किडनी का काम है रक्त में से पानी और बेकार पदार्थों को अलग करना। इसके अलावा शरीर में रसायन पदार्थों का संतुलन, लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भी सहायता करता है। इसका एक और कार्य है विटामिन-डी का निर्माण करना, जो शरीर की हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत बनाता है

कर्मयोग से तात्पर्य

“अनासक्त भाव से कर्म करना”। कर्म के सही स्वरूप का ज्ञान।

कर्मयोग दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘कर्म’ तथा ‘योग’ ।

कर्मयोग के सन्दर्भ ग्रन्थ – गीता, योगवाशिष्ठ एवं अन्य।

1. कर्मों का मनोदैहिक वर्गीकरण –

योग करते समय रहें सावधान... और बनें स्वास्थ्य

कहते हैं जहां भोग है वहां रोग है. जहां योग है वहां निरोग, लेकिन गलत योग रोगी बना सकता है. यानी योग करते समय सावधान रहें.

एक्सरसाइज करना अच्छी बात है. यह शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखती है. लेकिन अधकचरा ज्ञान कभी-कभी आपको बड़ी मुश्किल में डाल सकता है. 

इसलिए एक्सरसाइज करने से पहले कुछ बातें जरूर ध्यान कर लें. फिट रहने के कुछ खास मंत्र होते हैं जिन्हें आप अपनी दिनचर्या में यदि शामिल कर लें तो आप फिटनेस की ओर निरंतर बढ़ते चले जायेंगे.

प्रशिक्षक से सलाह ले

प्रेगनेंसी के समय में योगा

भले ही प्रेगनेंसी का समय बहुत ही तनावपूर्ण माना जाता हो, लेकिन उस अवस्‍था में आपको अपनी मन की शांति को बनाए रखना चाहिये। अगर तन और मन शांत रहेगा, तो यह स्‍ट्रेसफुल प्रोसेस भी बिल्‍कुल आसान हो जाएगा। इसके लिये जरुरी है कि प्रेगनेंसी के दौरान में योग आसन किया जाए, जिसको करने के पहले डॉक्‍टर की सलाह ले लें। योगा, चौथे महीने से ले कर प्रेगनेंसी के नवे महीने तक करने की सलाह दी जाती है। आइये जानते हैं कि प्रेनेंसी के दौरान कौन सा योगा करना फायदेमंद रहेगा।

दिमाग के लिए कुछ योगासन

दिनभर की थकान और तनाव के बाद कई बार हम छोटी छोटी चीजें भूल जाते हैं। लेकिन दिन में सिर्फ 10 मिनट योगा करने से इस परेशानी को भी दूर कर सकते हैं और अपनी याद्दाश्त मजबूत कर सकते हैं।

सर्वांगसन

कंधों के बल अपने शरीर को ऊपर की तरफ उठाने की यह मुद्रा दिमाग तक खून के बहाव को बढ़ाती है। यह योग आपको भावात्मक रूप से भी मजबूत बनाता है।

भुजंगासन

स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, नपुंसकता की योग चिकित्सा

मनुष्य ने स्वयं की गलतियों से शरीर को रोगी और अपूर्ण बना दिया | योग अपने आप में पूर्ण वैज्ञानिक विद्या है | हमारे ऋषियों ने योग का प्रयोग भोग के वजाय आध्यात्मिक प्रगति करने के लिए जोर दिया है जो नैतिक दृष्टि से सही भी है | परन्तु ईश्वर की सृष्टि को बनाये रखने के लिए संसारिकता भी आवश्यक है, वीर्यवान व्यक्ति ही अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है,संतानोत्पत्ति के लिए वीर्यवान होना आवश्यक है पौरूषवान (वीर्यवान) व्यक्ति ही सम्पूर्ण पुरुष कहलाने का अधिकारी होता है | वीर्य का अभाव नपुंसकता है इसलिए मौज-मस्ती के लिए वीर्य का क्षरण निश्चित रूप से दुखदायी होता है | ऐसे व्यक्ति स्वप्नदोष,शीघ्रपतन और नपुं

“योग विज्ञान है” – ओशो

 योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग का इस्लाम, हिंदू, जैन या ईसाई से कोई संबंध नहीं है। 

जिन्हें हम धर्म कहते हैं वे विश्वासों के साथी हैं। योग विश्वासों का नहीं है, जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है। इसलिए पहली बात मैं आपसे कहना चाहूंगा वह यह कि  योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग के प्रयोग के लिए किसी तरह के अंधेपन की कोई जरूरत नहीं है।

नास्तिक भी योग के प्रयोग में उसी तरह प्रवेश पा सकता है जैसे आस्तिक। योग नास्तिक-आस्तिक की भी चिंता नहीं करता है। विज्ञान आपकी धारणाओं पर निर्भर नहीं होता; विपरीत, विज्ञान के कारण आपको अपनी धारणाएं परिवर्तित करनी पड़ती हैं। कोई विज्ञान आपसे किसी प्रकार के बिलीफ, किसी तरह की मान्यता की अपेक्षा नहीं करता है। विज्ञान सिर्फ प्रयोग की, एक्सपेरिमेंट की अपेक्षा करता है।