मधुमेह कारण एवं निदान

हम दैनिक जीवन में जो आहार लेते हैं उससे हमारे शरीर को विभिन्न पोषक घटक प्राप्त होते हैउसमे शर्करा एक महत्वपूर्ण घटक है ।हमारे भोजन से प्राप्त शर्करा रक्त में मिलकर कोशिकाओं मैं जाती हैं जहां यह ऊर्जा मैं परिवर्तित होती है। रक्त शर्करा को ऊर्जा मैं परिवर्तित होने के लिए एक उतूप्रेरक इन्सुलिन की आवश्यकता होती हैं जो अग्नाशय मैं स्त्रवित होता है।शरीर में वात ,पित्त ,कफादि त्रिदोषज बिषमता जनित विभिन्न रोगों के कारण अग्नाशय मैं प्राकृतिक इन्सुलिन का स्त्राव अनियमित हो जाता है। इससे रक्त शर्करा का ऊर्जा मैं अपचयन नहीं हो पाता तथा शर्करा रक्त मैं रह जाती है।रक्तशर्करा के निरंतर अपरिवर्तन् से रक्त

ओशो डाइनैमिक ध्यान

ओशो डाइनैमिक ध्‍यान ओशो के निर्देशन में तैयार किए गए संगीत के साथ किया जाता है। यह संगीत ऊर्जा गत रूप से ध्‍यान में सहयोगी होता है और ध्‍यान विधि के हर चरण की शुरूआत को इंगित करता है|

निर्देश—
डायनमिक ध्‍यान आधुनिक मनुष्‍य को ध्‍यान अपलब्‍ध करवाने के लिए ओशो के प्रमुख योगदानों में से एक है।

ओशो गौरीशंकर ध्यान

इस विधि में पंद्रह-पंद्रह मिनट के चार चरण है। पहले दो चरण साधक को तीसरे चरण में सहज लाती हान के लिए तैयार कर देते है।

ओशो ने बताया है कि यदि पहले चरण में श्‍वास-प्रश्‍वास को ठीक से कर लिया जाए तो रक्‍त प्रवाह में निर्मित कार्बनडाइऑक्साइड के कारण आप स्‍वयं को गौरी शंकर जितना ऊँचा अनुभव करेंगे।

क्या आप स्वयं के प्रति सच्चे हैं? - ओशो

जानने के लिए अपने श्वास के प्रति सजग हों। 

 

" जब तुम कह रहे हो कि तुम खुश हो और तुम खुश नहीं हो, तो तुम्हारी श्वास अनियमित होगी।श्वास सहज नहीं होगी।यह असंभव है।"

 

बैठ जायें और एक दूसरे की आखों में देखें - ओशो

पहला चरण : दूसरे का अवलोकन करो

"बैठ जायें और एक दूसरे की आखों में देखें (बेहतर होगा पलकें कम से कम झपकें, एक कोमल टकटकी) बिना सोचे गहरे, और गहरे देखें।

 

"यदि आप सोचते नहीं, यदि आप केवल आंखों के भीतर टकटकी लगाकर देखते हैं तो शीघ्र ही तरंगें विलीन हो जायेंगी और सागर प्रकट होगा। यदि आप आंखों में गहरे देख सकते हैं तो आप अनुभव करेंगे कि व्यक्ति विलीन हो गया है, मुखड़ा मिट गया। एक सागरीय घटना पीछे छिपी है और यह व्यक्ति बस उस गहराई का लहराना था, कुछ अनजाने की, कुछ छुपे हुए की एक तरंग।"

 

सुप्त भद्रासन

सुप्तभद्रासन: योग में वर्णित एक विशेष आसन। लेटते समय भद्रासन करने की मुद्रा के रूप में इसे सुप्तभद्रासन (सुप्त-भद्रा + आसन) नाम दिया गया है। मूल रूप से, इस आसन की शारीरिक मुद्रा भद्रासन के समान नहीं है। 


तरीका

1. सबसे पहले पीठ के बल लेट जाएं।
2. अब पैरों को मोड़कर छाती पर ले आएं और पैरों के दोनों तलवों को आपस में मिला लें।
3. दोनों हाथों से पैरों को एक साथ पकड़ें और जाँघों के बीच खींचे।
4. अब अपनी श्वास को सामान्य रखें और 30 सेकंड तक स्थिर रहें।
5. फिर आसन को छोड़ दें और 30 सेकंड के लिए आराम करें।
. फिर आसन को दो बार और करें।

स्वस्तिकासन

स्वस्तिक का अर्थ होता है  शुभ। यह ध्यान के लिए एक उम्दा आसन है। इसके बहुत सारे शारीरक एवं मानसिक परेशानियों से आपको बचाता है।  यह तन एवं मन में संतुलन बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है। स्वस्तिकासन का महत्त्व इस बात से समझा जा सकता है कि योगग्रंथ जैसे हठयोग प्रदीपिका,घेरण्ड सहिंता में बैठकर किये जाने वाले आसनो का अगर जिक्र किया जाये तो सबसे पहले स्वस्तिकासन का ही नाम आता है।  भगवान आदिनाथ ने जिन चार आसनो को सबसे महत्त्वपूर्ण बताया है उनमे  से एक स्वस्तिकासन भी है।

“योग विज्ञान है” – ओशो

 योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग का इस्लाम, हिंदू, जैन या ईसाई से कोई संबंध नहीं है। 

जिन्हें हम धर्म कहते हैं वे विश्वासों के साथी हैं। योग विश्वासों का नहीं है, जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है। इसलिए पहली बात मैं आपसे कहना चाहूंगा वह यह कि  योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग के प्रयोग के लिए किसी तरह के अंधेपन की कोई जरूरत नहीं है।

नास्तिक भी योग के प्रयोग में उसी तरह प्रवेश पा सकता है जैसे आस्तिक। योग नास्तिक-आस्तिक की भी चिंता नहीं करता है। विज्ञान आपकी धारणाओं पर निर्भर नहीं होता; विपरीत, विज्ञान के कारण आपको अपनी धारणाएं परिवर्तित करनी पड़ती हैं। कोई विज्ञान आपसे किसी प्रकार के बिलीफ, किसी तरह की मान्यता की अपेक्षा नहीं करता है। विज्ञान सिर्फ प्रयोग की, एक्सपेरिमेंट की अपेक्षा करता है।